किताबों को दोस्त बना कर तो देखो
माँ: बेटा पढ़ लो board exams हैं।
बेटा: आप अपना काम करो मैं पढ़ लूँगा।
माँ: बेटा तुम्हारे पापा को तुमसे बहुत उम्मीदे हैं
बेटा: यहा तो बैठना ही बेकार हैं।(उठ के चला जाता है)
एक महीने बाद
बाप: सबसे महंगी accademy में इसकी tuition लगवाई थी ताकी board exams में पास हो जाता लेकिन नही जिस बच्चे ने पढ़ना नही नी हैं उससे बात करना ही बेकार हैं।
बेटा अपने कमरे में जाकर जोर से दरवाज़ा बंद कर देता हैं।
बाप: हां हां तोड़ दो दरवाज़ा बाप की मेहनत की कमाई का हैं तुम्हारा क्या जाता हैं।
माँ: बस कीजिये अब ,डॉ ने कहा हैं उसे अगर ज्यादा कुछ कहेगे तो वो कुछ कर ना बैठे।
एक लम्बी उदासी के साथ ख़ामोशी.....
जी हां यहा ये पंक्तिया काल्पनिक है लेकिन 70% घरो में ये समस्या आम हो गयी हैं। आजकी युवा पीड़ी को सबकुछ चाहिए,सारे एशो-आराम चहियॆ लेकिन मेहनत के नाम से कतराती हैं। माँ बाप महंगे मोबाइल फ़ोन दीलवादे तो ऐसे माँ बाप दुनिया में सबसे अच्छे लेकिन वोही माँ-बाप अगर बच्चे से कुछ उम्मीदे रखे उसे पूरा करने के लिए थोड़ी मेहनत करने को कह दे तो वोही माँ-बाप दुश्मन बन जाते हैं। आखिर ऐसा क्यों ?? माँ -बाप अगर माँ-बाप अपनी ऐसो- आराम का ना सोच कर कंजूसी कर के अपने कई दिल के अरमानों को अनदेखा कर के बच्चे के अच्छे भविष्य के बारे में सोच सकते हैं तो क्या बच्चे थोड़ी सी मेहनत करके अपने माँ-बाप को थोड़ी सी ख़ुशी नही दे सकते?
आजकल की युवापीढ़ी को अक्सर ये कहते हुए सुना जाता हैं कि अगर माँ-बाप हमारे लिए कुछ कर रहे हैं हमे अच्छे से अच्छा दे रहे हैं तो क्या हो गया ये उनका फ़र्ज़ हैं। तो कोई ये बताये सारे फ़र्ज़ माँ-बाप के लिए ही हैं,आपका कोई फ़र्ज़ नही माँ-बाप के प्रति??
माँ-बाप आखिर मांग क्या रहे है पेपरों में अच्छे नंबर और उससे फायदा किसे होगा भविष्य माँ का सुरक्षित होगा या आपका,दुनिया में समाज में प्रशंसा आपकी होगी या बाप की,अच्छी पढाई से नौकरी माँ को मिलेगी या उसे जिसने मेहनत की हैं।
माना आजकल competition बहुत बढ़ गया हैं लेकिन इतना भी नही बढ़ा हैं कि थोड़ी सी मेहनत करके आप passing नंबर भी नही ला सकते। दिन में 24 घंटे में से अगर स्कूल के इलावा 3-4घंटे बच्चे रोज पढ़े तो पढाई बिलकुल मुश्किल नही हैं। लेकिन हम रोज नही पढ़ते,इसलिए परीक्षा के समय हमे पढना
मुश्किल लगता हैं और जल्दी याद भी नही
होता। आज की युवापीढ़ी हर जगह बस कमी ही ढुढती हैं, ये सही नही हैं वो सही नही हैं।
अरे अगर सही नही हैं तो सही बनाओ ,
कोशिश तो करो कुछ सही करने की।
आजकल डॉ लोगो ने एक नई बात माता-
पिता के दिमाग में डाल दी हैं कि बच्चे को
डांटों मत कही बच्चा कोई गलत कदम ना
उठा ले कही वो जान देने की न सोचे,मैं ये
नही कह रही की डॉ लोग गलत हैं ,
लेकिन इस बात का नाजायज़ फायदा आज की युवापीढ़ी उठा रही हैं। सब ऐशो-
आराम मिले तब कोई दिक्कत नही जरा सी
मेहनत करनी पड़ जाये तो ज़िन्दगी देने की
सोच रखते हैं । आखिर क्यों ?? जब हर तरह के नये गैजेट्स युवा पीढ़ी के बाये हाथ का काम हैं तो पढाई से जी क्यों चुराते हैं।
पढाई को एक खौफ समझते है,जो की
गलत हैं। जिस तरह शौक से हर मुश्किल
से मुश्किल गैजेट्स का इस्तेमाल करना
कुछ मिनटों में सीख सकते हैं तो पढ़ाई भी
सीख सकते हैं।जरूत हैं तो सिर्फ दिल से
सीखने की। दिल से किया गया काम ही
सफल होता हैं। पढ़ाई को बोझ ना समझ
कर अगर दिल से किया जाये तो देखना
आप खुद ही कहोगे पढ़ाई उतनी भी मुश्किल
नही हैं जितना आप समझते थे। आजकल
की युवा पीड़ी अपना अधिक समय सोशल साइट्स पर बिताती हैं जिसके कारण सोशल
साइट्स को अच्छा नही समझा जाता,जो
की गलत हैं। समस्या सोशल साइट्स की
नही हैं,हमने खुद इसे समस्या बनाया हैं
सोशल साइट्स बुरी नही हैं अगर इसका
सही ढंग से प्रयोग किया जाये। बच्चों को
बहुत कुछ सीखने को मिलता हैं बस अगर
सीखने के मकसद से इसका प्रयोग किया
जाये। मस्ती मनोरंजन के लिए भी करे लेकिन
पढ़ाई के साथ।आजकल तो युवा पीडी
मल्टी टास्क यानि बहुत से कार्य एक साथ
करने में विश्वास रखती हैं तब तो पढ़ाई
में कोई कठिनाई आनी ही नही चाहिए।
खेलने के समय खेलो पढ़ाई के समय
पढ़ाई मस्ती के समय मस्ती करो। एक
टाइम टेबल बनाओ जिसमें सभी कामों
को जगह दो फिर देखो जिंदगी किस ऊँचाई
को छुती हैं हां पर सिर्फ टाइम टेबल बनाना
नही हैं उसपर नियम से चलना भी हैं।
अंत में मैं आज की युवा पीड़ी से सिर्फ
इतना कहना चाहुगी की मौज मस्ती के
साथ माँ बाप के अरमानों की भी कदर करे
पढ़ाई को हऊआ ना समझे दोस्त समझे
जो जिंदगी में कभी आपका साथ नही छोड़ेगा
और हर मुश्किल में आपका साथ देगा।
इस नए साल में किताबों को दोस्त बनाकर तो देखो 📖🖋