Wednesday, July 13, 2016

मौत

कांटो से भरी राहें थी
दिल में ख्वाहिशे थी
रो रहे थे हंस रहे थे
शुक्रीया रब्बा तेरा कर रहे थे
पर तूने रबा ये क्या कर दिया
मौत से रूबरू कर दिया
पल में मेरी हस्ती मिट गयी
ज़िन्दगी की धज्जिया उड़ गयी
दुःख के बाद सुख हैं ऐसा विश्वास था
ऐ रब्बा ये कैसा तेरा इन्साफ था
कहते मेरे कर्मो का फल था
लेकिन मैं तेरा, हाँ रब्बा तेरा भक्त था
तेरी मर्ज़ी के बिना पत्ता नही हिलता
मेरे कर्मो का लिखना भी तो तेरे हाथ था
ज़िन्दगी कभी आसान ना थी
होंठो पे शिकायत भी ना थी
हर हाल में तेरा गुणगान था
क्या मौत तेरी भक्ति का प्रसाद था...

No comments:

Post a Comment