Tuesday, November 9, 2010

काश हम भी बच्चे होते,कभी नही हम kex होते,खाते - पीते हँसते गाते,मस्ती में दिन गुजारते,कर्तव्यों का बोझ ना होता,दिल में गम का पहरा ना होता,जो चाहिए वो पापा दिलवाते,मम्मी का दुलार पाते,सपने कितने सुहाने होते,रात को सोते सुबह जागते,वो दिन अब चले गये है,मौसम अब बदल गये है,सपने सारे टूट गये है,रात को भी हम जगे हुए है,अब तो हर पल हम है रोते,जीवन में क्यों ये संघर्ष है होते,काश हम भी बच्चे होते,कभी नही हम बड़े होते...........

2 comments:

  1. बाल मन की भावनाओं को बहुत ही सुन्दर ढंग से व्यक्त किया है आप ने ,, और साथ ही बाल पन के उदेव्गो का व्यस्क मन की छट पटाहट और बनाबटी पन से तुलनात्मक अध्यन बहुत ही सटीक ढंग से किया गया है
    सादर
    प्रवीण पथिक

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  2. बहुत बहुत शुक्रिया...

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